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दिल्ली अग्निकांड में भ्रष्टाचार की मार: नियमों को ताक पर रखकर बने अवैध फ्लैट

विवेक विहार अग्निकांड ने दिल्ली की रिहायशी इमारतों में व्याप्त भ्रष्टाचार और सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर कर दिया है, जहां अवैध निर्माण ने नौ लोगों की जान ले ली।

दिल्ली के विवेक विहार में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजधानी की रिहायशी इमारतें भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के कारण बारूद के ढेर पर खड़ी हैं। इस दुखद हादसे में नौ बेगुनाह लोगों की जान चली गई, लेकिन जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी हैं।

मिशनरयूम की जांच के अनुसार, 800 गज के जिस भूखंड पर यह चार-मंजिला इमारत खड़ी थी, वहां सरकारी दस्तावेजों में केवल छह फ्लैट बनाने की अनुमति थी। हालांकि, मौके पर आठ फ्लैट बनाए गए थे। नियमों को दरकिनार कर किए गए इस अतिरिक्त निर्माण ने न केवल सुरक्षा मानकों का उल्लंघन किया, बल्कि एक ‘डेथ ट्रैप’ का रूप ले लिया, जहां से जान बचाकर निकलना असंभव हो गया था।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यह दर्शाती है कि कैसे कागजी अनुमतियों और जमीन पर हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर जानलेवा साबित होता है। जब निर्माण की प्रक्रिया में ही बुनियादी नियमों का पालन नहीं होता, तो ऐसी दुर्घटनाएं केवल संयोग नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता बन जाती हैं।

स्थानीय मास्टर प्लान के अनुसार, इस क्षेत्रफल पर अधिकतम छह फ्लैट की अनुमति थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद और भी सीमित किया जाना था। लेकिन, इमारत में आठ फ्लैट का निर्माण किया गया और खिड़कियों पर लोहे की मोटी ग्रिल लगा दी गईं। यही ग्रिलें बचाव कार्य में सबसे बड़ी बाधा बनीं, क्योंकि दमकलकर्मियों को लोगों को बाहर निकालने के बजाय पहले उन्हें काटने में समय बर्बाद करना पड़ा।

नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जो प्रतिवर्ष अपने सूचना विभाग पर करोड़ों रुपये खर्च करता है। हादसे के वक्त निगम की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया कि इमारत का नक्शा पास था या नहीं और उसे पूर्णता प्रमाण पत्र जारी किया गया था या नहीं। जनप्रतिनिधियों का मौके पर पहुंचकर दुख जताना, सिस्टम की जिम्मेदारी तय करने के लिए काफी नहीं है।

उपराज्यपाल के कड़े निर्देशों और फायर ऑडिट के आदेशों के बावजूद, धरातल पर विभाग की सुस्ती बनी हुई है। बिजली सुरक्षा ऑडिट की स्थिति भी कागजों तक ही सीमित है, जहां केवल उपभोक्ता की स्व-घोषणा के आधार पर कनेक्शन दे दिए जाते हैं। सुरक्षा निरीक्षणों का अभाव ही है कि आज शहर की तमाम इमारतें ऐसे खतरों के साये में खड़ी हैं।

अंत में, यह समझना जरूरी है कि भ्रष्टाचार जब भी सुरक्षा मानकों के साथ समझौता करता है, तो उसका खामियाजा आम आदमी को अपनी जान देकर भुगतना पड़ता है, जिसके लिए कोई भी विभाग जवाबदेही लेने को तैयार नहीं होता।

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