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महिला आरक्षण पर विशेष सत्र को पाखंड बताया: सचिन पायलट

रायपुर में सचिन पायलट ने महिला आरक्षण के लिए विधानसभा के विशेष सत्र को पाखंड और झूठ का अमल बताया। उन्होंने केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाए।

महिला आरक्षण पर छत्तीसगढ़ विधानसभा के विशेष सत्र को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने तीखा हमला बोला है। रायपुर में उन्होंने कहा कि इस तरह का कदम असल मकसद को छिपाने की कोशिश भर है और इसे पाखंड की तरह लिया जाना चाहिए।

पायलट ने केंद्र की मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को समय पर लागू करने की बजाय जानबूझकर लंबित रखा गया। उनका कहना था कि यह विधेयक संवैधानिक संशोधन के दायरे में आता है और इसे पहले ही पारित किया जा चुका था।

इस संदर्भ में पायलट ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण की आड़ में राजनीतिक प्रक्रिया के कुछ कदम पहले उठाने की कोशिश की गई, जबकि विरोध करने वाली पार्टियां इस पर एकजुट थीं। उन्होंने जनगणना से पहले परिसीमन कराने की बात का उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्ष ने इसका विरोध किया था।

पायलट ने अपने बयान में यह स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी अपने संकल्प पर कायम है और इस मुद्दे पर आगे भी दबाव बनाने की योजना है। उन्होंने विशेष सत्र को लेकर बीजेपी की मंशा पर सवाल खड़े किए।

इस दौरान उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ, वह उनके शब्दों में “उनके पाखंड और झूठ को अमल में लाने” की कोशिश थी। पायलट के मुताबिक कांग्रेस इसे बेनकाब करने की दिशा में सक्रिय है।

यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ समयबद्धता और प्रक्रिया की साफियत भी जनता की नजर में रहती है। जब सत्र जैसे कदम चर्चा के केंद्र में आते हैं, तो असर केवल राजनीति तक नहीं, भरोसे तक भी पहुंचता है।

पायलट के बयान के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में महिला आरक्षण को लेकर बहस तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। कांग्रेस का रुख स्पष्ट करते हुए यह भी संकेत देता है कि विपक्ष केंद्र सरकार पर जवाबदेही तय कराने की कोशिश कर सकता है।

अब यह देखना होगा कि विशेष सत्र में उठने वाले मुद्दों के बाद सियासी बयानबाजी किस दिशा में जाती है और महिला आरक्षण पर आम नागरिकों की अपेक्षाएं कितनी हद तक पूरी होती हैं। इसी वजह से आने वाले दिनों में बयान और राजनीतिक रणनीति दोनों तेज होने की संभावना है।

अंत में, सचिन पायलट की यह टिप्पणी बताती है कि महिला आरक्षण का मुद्दा सिर्फ प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई भी बन चुका है। लोगों के लिए सवाल यही रहेगा कि वादा, नीति और समय तीनों में संतुलन कैसे बनेगा।