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समयसीमा में जांच पूरी ना करने पर हाई कोर्ट सख्त, कहा-तय अवधि के बाद बिना परमिशन पारित आदेश विधिसम्मत नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने समयसीमा में विभागीय जांच पूरी न होने और अनुमति बिना आदेश पारित करने पर प्रधानाचार्या के निलंबन अनुमोदन को रद कर दिया।

विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने समयसीमा के भीतर विभागीय जांच पूरी न करने और अदालत से समय बढ़ाने की अनुमति न लेने पर प्रधानाचार्या के निलंबन अनुमोदन आदेश को रद कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायालय द्वारा तय समयसीमा का पालन करना जरूरी है और बिना अनुमति देरी से पारित आदेश को वैध नहीं माना जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश सिंह की एकलपीठ ने सीतापुर स्थित श्री दयानंद रमेश्वर प्रसाद हंसरानी आर्य कन्या इंटर कालेज की प्रधानाचार्या डा.. ज्ञानवती दीक्षित की याचिका पर दिया। याचिका में 23 जून 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके जरिये जिला विद्यालय निरीक्षक ने प्रबंध समिति की ओर से की गई निलंबन संस्तुति को मंजूरी दी थी। क्या था याची का कहना?. याची का कहना था कि हाई कोर्ट ने 11 अप्रैल 2025 को विभागीय कार्यवाही 51 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था, लेकिन संबंधित प्राधिकारी ने 71 दिन बाद आदेश पारित किया। साथ ही समय बढ़ाने के लिए अदालत से कोई अनुमति भी नहीं ली गई। सुनवाई के दौरान प्रबंधन पक्ष ने दलील दी कि केवल समयसीमा पार होने से कार्यवाही स्वतः निरस्त नहीं हो जाती। इसके समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला दिया गया। वहीं, याची पक्ष ने कहा कि अदालत से समय विस्तार लिए बिना कार्यवाही जारी रखना न्यायालय के आदेश की अवहेलना के समान है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों से स्पष्ट है कि समयसीमा बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए सक्षम न्यायालय से अनुमति लेना जरूरी होता है। कोर्ट ने क्या पाया?. कोर्ट ने पाया कि इस मामले में संबंधित प्राधिकारी ने समय विस्तार के लिए कोई आवेदन नहीं किया और तय अवधि बीतने के बाद आदेश जारी कर दिया। पीठ ने 23 जून 2025 के आदेश को रद करते हुए संबंधित प्राधिकारी को नए सिरे से कार्यवाही आगे बढ़ाने की छूट दी है। साथ ही निर्देश दिया कि प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने की तिथि से दो माह के भीतर पूरी प्रक्रिया समाप्त की जाए।

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