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महिला आरक्षण और परिसीमन: सरकार ने 14 तीखे सवालों के दिए जवाब

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए विस्तृत FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न) ने महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन से जुड़ी तमाम अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास किया है। Misryoum के माध्यम से हम उन 14 मुख्य बिंदुओं को बारीकी से समझ रहे हैं, जो देश की भविष्य की राजनीति और प्रतिनिधित्व की दिशा तय करेंगे।

## क्यों जरूरी थी परिसीमन और आरक्षण की नई कवायद?

केंद्र सरकार का स्पष्ट तर्क है कि नारीशक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए परिसीमन एक अनिवार्य शर्त थी। सरकार का मानना है कि यदि वे 2026 की जनगणना और उसके बाद के परिसीमन की प्रतीक्षा करते, तो 2029 के चुनाव में महिलाओं को इसका लाभ मिलना असंभव हो जाता। इसी कारण, प्रक्रिया को गति देने के लिए परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण को जोड़कर देखा जा रहा है।

## सीटों का गणित और प्रतिनिधित्व का भविष्य

संसद में लोकसभा सीटों की संख्या को 1976 के बाद से 550 पर स्थिर रखा गया था, जबकि देश की जनसंख्या 54 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ हो गई है। Misryoum के विश्लेषण के अनुसार, 850 सीटों का प्रस्ताव जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक बड़ा प्रयास है। सरकार का दावा है कि सभी राज्यों में समान रूप से 50 प्रतिशत सीटों की वृद्धि होने से किसी भी राज्य, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत, आरक्षित सीटों की संख्या 131 से बढ़कर 205 होने से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों का संसद में कद और बढ़ेगा।

यह समझना आवश्यक है कि परिसीमन का अर्थ केवल सीमाओं का बदलाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गहराई को बढ़ाना है। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर काफी चर्चा थी कि क्या सरकार किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि परिसीमन आयोग अधिनियम में कोई नया बदलाव नहीं किया गया है। साथ ही, जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर सरकार ने जोर दिया कि यह प्रक्रिया पहले से ही जारी है, इसलिए इसे आरक्षण विधेयक से जोड़ना उचित नहीं है। धर्म आधारित आरक्षण को लेकर भी स्थिति साफ करते हुए सरकार ने दोहराया कि भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी के लिए अलग विधेयक लाना एक तकनीकी अनिवार्यता थी, ताकि इन केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। अंततः, यह पूरा खाका आने वाले दशकों में भारत की संसद के स्वरूप को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है।

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