पत्नी से तंग आकर इंजीनियर ने दी जान: न्याय की मांग

रोबोट इंजीनियर प्रद्युम्न कुमार यादव और परिजन – फोटो : अमर उजाला खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो Link Copied यूपी स्थित नगरपालिका परिषद कुशीनगर के वार्ड स्वामी विवेकानंद नगर, बेलवा पलकधारी में इन दिनों मातम पसरा है। घर के बाहर सन्नाटा है और भीतर हर आंख नम। 33 वर्षीय रोबोट इंजीनियर प्रद्युम्न कुमार यादव की मौत ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है। मां की सूनी आंखें अब भी दरवाजे पर टिक जाती हैं, मानो बेटा एक बार फिर लौट आएगा और कहेगा- ‘मां, मैं आ गया।’ Trending Videos ‘काश, वह मुझे भी साथ ले गया होता’ गोरखपुर के कुसम्ही जंगल स्थित बुढ़िया माई मंदिर के पास पेड़ से लटककर जान देने वाले प्रद्युम्न की मौत के बाद घर में चीख-पुकार मची हुई है। शनिवार को जब परिजन से बात हुई तो 72 वर्षीय मां कलावती देवी बार-बार बेसुध हो जा रही थीं। रोते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरा साहब बेटा अब नहीं रहा। तीन महीने पहले देखा था। आखिरी बार भी नहीं मिल पाया। फेसबुक पर उसका आखिरी वीडियो देखा तो कलेजा फट गया। काश, वह मुझे भी साथ ले गया होता।’ ‘हमारे घर का सोना चला गया’ बगल में बैठी बहन पूनम की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने कहा, ‘हमारे घर का सोना चला गया। मेरा भाई बहुत सीधा और मिलनसार था। उसे कभी चैन से जीने नहीं दिया गया। अब बस यही चाहते हैं कि उसे न्याय मिले।’ किस बात से परेशान था प्रद्युम्न परिजनों के मुताबिक, प्रद्युम्न पिछले कई वर्षों से वैवाहिक विवाद, कोर्ट-कचहरी, आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव से जूझ रहा था। बड़े भाई राघवेंद्र सिंह यादव ने बताया कि प्रद्युम्न ऑटोमोबाइल सेक्टर में रोबोट इंजीनियर के पद पर कार्यरत था। उसने अपने करियर की शुरुआत गुड़गांव से की थी और वर्तमान में मध्य प्रदेश की एक कंपनी में नौकरी कर रहा था। राघवेंद्र ने बताया कि हाल ही में अदालत से भरण-पोषण के मामले में आठ हजार रुपये प्रतिमाह खर्चा बहाल हुआ था। साथ ही करीब तीन लाख 84 हजार रुपये की वसूली तय होने के बाद वारंट जारी हुआ था। इसी के बाद वह काफी तनाव में रहने लगा था। अंदर से टूट चुका था प्रद्युम्न परिवार के परिजनों के मुताबिक 12 मई को पडरौना कोर्ट में सुनवाई के बाद उसकी फोन पर बात हुई थी। उसे समझाने की कोशिश की गई, लेकिन वह भीतर से पूरी तरह टूट चुका था। बाद में वह गोरखपुर पहुंचा और शाम करीब छह बजे मंदिर में दर्शन करने के बाद यह कदम उठा लिया।
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