India News

सलीम वास्तिक: 30 हजार के लिए नाबालिग की हत्या और खुद को मरा बताकर यूट्यूबर बनने की कहानी

31 साल पहले फिरौती के लिए नाबालिग की हत्या करने वाला सलीम वास्तिक दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ गया। खुद को मृत घोषित कर नाम बदलकर यूट्यूबर के तौर पर छिपे इस अपराधी का काला सच अब सामने आया है।

सलीम वास्तिक का नाम बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया और चर्चाओं के केंद्र में है। 31 साल पहले फिरौती के लिए एक नाबालिग की हत्या करने के जुर्म में सजा काट रहा यह शख्स खुद को मृत घोषित करवाकर दशकों तक कानून की आंखों में धूल झोंकता रहा। आज Misryoum के जरिए हम इस अपराधी की उस खौफनाक यात्रा का पर्दाफाश कर रहे हैं, जो उसे सलाखों के पीछे ले आई है।

अतीत का वह काला अध्याय और फिरौती की साजिश

वर्ष 1993 का वह समय था जब दिल्ली के गोकुलपुरी में एक नाबालिग को अगवा किया गया था। सलीम वास्तिक और उसके साथी अनिल ने महज 30 हजार रुपये की फिरौती के लिए इस मासूम की हत्या कर दी थी। साल 1997 में अदालत ने दोनों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा काटने के दौरान वर्ष 2000 में सलीम को हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन वह बाहर आते ही फरार हो गया और दोबारा कभी अदालत में हाजिर नहीं हुआ।

पहचान बदलकर यूट्यूबर बना अपराधी

फरारी के दौरान सलीम ने एक शातिर चाल चली। उसने कागजों में खुद को मृत घोषित करवा लिया ताकि पुलिस की फाइलें बंद हो जाएं। नई पहचान के साथ वह लोनी में रहने लगा और धीरे-धीरे सोशल मीडिया का सहारा लेकर एक यूट्यूबर बन गया। अपने विवादास्पद बयानों और एक विशेष धर्म पर टिप्पणियों के जरिए उसने एक अलग पहचान बनाई। कोई नहीं जानता था कि धर्म का चोला ओढ़े यह यूट्यूबर असल में एक सजायाफ्ता कातिल है।

कानून की लंबी बाहें और अंत की शुरुआत

यह मामला तब खुला जब हाल ही में सलीम पर हुए हमले के बाद पुलिस की जांच का दायरा बढ़ा। कड़कड़डूमा कोर्ट से मिले पुराने फिंगर प्रिंट और रिकॉर्ड्स का मिलान करते ही दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा के सामने उसका सच आ गया। इंस्पेक्टर रॉबिन त्यागी की टीम ने जाल बिछाया और 31 साल पुराने हत्यारे को दबोच लिया।

इस गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि अपराध का रास्ता चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, न्याय की चक्की देर से ही सही, चलती जरूर है। सलीम वास्तिक की यह कहानी केवल एक अपराधी का अंत नहीं है, बल्कि उन पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की जीत भी है जिन्होंने दशकों तक हार नहीं मानी। एक डिजिटल युग में, जहाँ पहचान छुपाना आसान लगता है, तकनीक और पुलिस की तत्परता ने इसे फिर से चुनौतीपूर्ण बना दिया है। समाज में इस तरह के तत्वों की मौजूदगी यह भी बताती है कि हमें सोशल मीडिया पर मिलने वाली हर जानकारी और व्यक्तित्व को कितनी सावधानी से देखना चाहिए।